सिर्फ संदेह से सजा नहीं दी जा सकती, साक्ष्य जरूरी — CBI कोर्ट के आदेश को हाईकोर्ट ने खारिज कर फर्जी लोन मामले में बैंक मैनेजर समेत तीन आरोपियों को बरी किया। अदालत ने कहा कि जब तक आरोप सिद्ध करने के लिए ठोस साक्ष्य नहीं होते, दोषी ठहराना संभव नहीं है, केवल शक पर सजा नहीं दी जा सकती।

मामला फर्जी लोन वितरण का था जिसमें आरोपितों पर बैंक को नुकसान पहुँचाने के आरोप लगे थे।
CBI कोर्ट पहले आरोप तय कर सजा देने का निर्देश दे चुका था, जिसे हाईकोर्ट ने निरस्त कर दिया। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि आपराधिक मामलों में “बिलकुल प्रमाण” होना अनिवार्य है और केवल संदेह पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता

कानूनी सन्दर्भ: न्यायपालिका अक्सर यह दोहराती रही है कि लोन डिफॉल्ट या शक ही धोखाधड़ी का सबूत नहीं है, अपराध की स्पष्ट मंशा एवं साक्ष्य होने चाहिए — अन्य मामलों में भी अदालतों ने इसी सिद्धांत पर फैसले दिए हैं।


