नक्शे में मंदिर, जमीन पर माफिया! आखिर किसके दबाव में उलझा सीमांकन?

Jan Mitan
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रायगढ़।

बूढ़ी माई मंदिर ट्रस्ट की जमीन के सीमांकन को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। क्या व्हाइट कॉलर और सत्ता के दबाव में सीमांकन की प्रक्रिया को जानबूझकर अस्पष्ट बनाया जा रहा है? गुप्त सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार रुक्मणी विहार कॉलोनी के भीतर लगभग 90 डिसमिल जमीन “दबी” हुई है, जिसे लेकर स्थिति लगातार रहस्यमयी बनती जा रही है।

गहन विश्लेषण और सूत्रों के अनुसार, मंदिर ट्रस्ट की जमीन मेन रोड से लेकर कॉलोनी परिसर तक फैली हुई बताई जा रही है। इतना ही नहीं, कॉलोनी के भीतर भी ट्रस्ट की जमीन होने की प्रबल संभावना जताई जा रही है। मेन रोड से दाईं ओर अघरिया सदन के पीछे स्थित पार्क को निगम द्वारा मंदिर से अधिग्रहित किया जाना भी कई सवालों को जन्म देता है।

वहीं दूसरी ओर, ट्रस्ट की जमीन को कथित तौर पर दो बार बेचे जाने की बात सामने आ रही है। वर्तमान में तीन से चार व्यक्तियों द्वारा इस जमीन पर कब्जा किया गया है, जहां एक स्कूल भी संचालित हो रहा है। इसके अलावा कुछ रिक्त भूमि पर गेट लगाकर अवैध कब्जा जमाए जाने की भी जानकारी सामने आई है।

सूत्रों के अनुसार, 7 से 8 अधिकारियों की जांच दल टीम ने लगातार चार बार सीमांकन किया, जिसमें यह बात स्पष्ट होकर उभरी कि ट्रस्ट की खाली जमीन पर भू-माफियाओं ने पैसे और सत्ता के बल पर कब्जा कर लिया है। बताया जा रहा है कि कब्जाधारी भू-माफिया सत्ताधारी पार्टी से जुड़े हुए हैं, ऐसे में सीमांकन प्रक्रिया में बाधा आना “स्वाभाविक” माना जा रहा है। सीमांकन प्रक्रिया लगभग पूर्ण बताई जा रही है, लेकिन निष्कर्ष यही निकलकर सामने आ रहा है कि सत्ताधारी दल से जुड़े लोगों के खिलाफ कार्रवाई करना प्रशासन के लिए आसान नहीं है, क्योंकि इन्हें कथित तौर पर उच्च संरक्षण प्राप्त है।

एक और बड़ा सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या पूर्व में दस्तावेजों के साथ छेड़छाड़ की गई थी? क्या इसी कारण आज सीमांकन और कार्रवाई की राह में लगातार अड़चनें आ रही हैं?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि नक्शे के अनुसार मंदिर ट्रस्ट से लगी संपूर्ण जमीन कॉलोनाइज़र की बताई जा रही है, तो फिर बूढ़ी माई मंदिर ट्रस्ट की जमीन आखिर गई कहां?

इन तमाम घटनाक्रमों के बीच वर्तमान मंत्री की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। विगत कई कार्यक्रमों में मंत्री द्वारा मंदिर निर्माण के लिए खुलकर सहयोग की बातें कही गई हैं, लेकिन अब सवाल यह है कि क्या वे बूढ़ी माई मंदिर ट्रस्ट की जमीन को अतिक्रमण से मुक्त कराने में भी ठोस भूमिका निभाएंगे, या फिर समय के साथ फाइलें एक बार फिर दबा दी जाएंगी?

फिलहाल, पूरे मामले पर प्रशासनिक चुप्पी और राजनीतिक संरक्षण के आरोपों ने इस प्रकरण को और भी संवेदनशील बना दिया है। अब देखना यह होगा कि क्या बूढ़ी माई मंदिर ट्रस्ट को उसका हक मिलेगा या यह मामला भी कागजों और सीमांकन रिपोर्टों में ही उलझकर रह जाएगा।

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