भारतीय रुपया गुरुवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले एक बार फिर सर्वकालिक निचले स्तर के करीब गिर गया। विदेशी मुद्रा बाज़ार में रुपये की विनिमय दर डॉलर के मुकाबले लगभग ₹90.47 तक कमजोर दर्ज की गई, जो पिछले रिकॉर्ड को तोड़ते हुए नई चिंता का विषय बन गई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि विदेशी फंड निवेशकों द्वारा भारतीय बाजार से निकासी (equities और बॉन्ड दोनों से), और भारत–यूएस व्यापार समझौते में देरी जैसी वैश्विक और घरेलू कारकों ने रुपये पर दबाव बनाया है।

विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) के प्रवाह में कमी के कारण रुपये में गिरावट आई है, जिससे निवेशकों के भरोसे में कमी आई और डॉलर की मांग बढ़ी है। लगातार बिकवाली और डॉलर की मजबूत पकड़ के चलते रुपये की गिरावट जारी रही।
रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (RBI) ने बाज़ार में हल्का हस्तक्षेप भी किया, लेकिन इससे बड़े स्तर पर गिरावट को रोकने में मदद नहीं मिल पाई।
आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार, रुपये की इस गिरावट का असर आम जनता के खर्चों पर भी दिख सकता है — आयातित वस्तुएँ, ईंधन, इलेक्ट्रॉनिक्स तथा विदेशी यात्राएँ महँगी हो सकती हैं। विनिमय दर में यह कमजोरी इस साल के लिए रुपये को एशिया की सबसे कमजोर प्रमुख मुद्राओं में से एक बना रही है।


